Wednesday, August 27, 2008

चाँद छत पर

चाँद को छत पे उतर आने दे।
चाँदनी से ज़रा बतियाने दे।

ज़िन्दगी और आ नज़दीक ज़रा,
साँस को साँस से टकराने दे।

होंठ पर होंठ ज़रा रखने दे,
रूह को काँप-काँप जाने दे।

मैं ही सुल्झाऊंगा तेरी उलझन,
तू मुझे होश में तो आने दे।

अपनी आँखों में उजाले भरकर,
मुझे जुनूं की राह जाने दे।

*शाहिद समर

5 comments:

योगेन्द्र मौदगिल said...

bada achha prayas hai aapka. nirantarata banaen.
email ki bajay blog par tippani karen.
dhanywad
--
yogindermoudgil.blogspot.com

गौतम राजऋषि said...

.....मैमैं ही सुल्झाऊंगा तेरी उलझन,
मुझे तू होश में तो आने दे।
क्या बात है शाहिद जी....मजा आ गया और मेरी हौसलाअफ़जाई का बहुत बहुत शुक्रिया.और आपके ब्लौग पे इतनी अच्छी रचनायें देख प्रफ़्फ़ुलित हो गया मन.शुभकामनायें

Vinay said...

कमाल का लिखा है शाहिद साहब

फ़िरदौस ख़ान said...

चाँद को छत पे उतर आने दे।
चाँदनी से ज़रा बतियाने दे।

ज़िन्दगी और आ नज़दीक ज़रा,
साँस को साँस से टकराने दे।

बहुत अच्छी रचना है...

seema gupta said...

'seen your blog first time. Very touching romantic and emotional words. Loved reading them' Regards