Sunday, December 16, 2012

तिलिस्मे मोहब्बत

 चांद घुलने लगा धीरे-धीरे
शब पिघलने लगी धीरे धीरे
ये तिलिस्मे-मोहब्बत है, क्या है,
जां निकलने लगी धीरे-धीरे।...

पर्वतों को खबर भी हुई ना,
फूटकर ऐसे निकला है झरना।
दिल में अहसास की प्यासी नदिया,
अब मचलने लगी धीरे-धीरे।....

एक मौसम जो ठहरा हुआ था,
मन का गुलशन जो सहरा हुआ था।
अजनबी एक खुशबू को छूकर,
रुत बदलने लगी धीरे-धीरे।....

तड़प है, कसक है ये क्या है,
शफक है, लहक है ये क्या है।
इक शरारा सा जो छू गया क्या,
रूह जलने लगी धीरे-धीरे।....

जी में आता है कुछ ख्वाब बुन लूं,
बिखरी हुई नीदें चुन लूं।
जिंदगी जो बिछड़ सी गई थी,
साथ चलने लगी धीरे-धीरे।.....