शहादत और जन्मभूमि का सम्मान है वंदे मातरम्
मनीन्द्र कुमार दुबेभारतीय स्वतंत्रता संग्राम में देश में आजादी की अलख जगाने वाला वंदे मातरम् इन दिनों सियासी दांव-पेंच का शिकार हो गया है। स्वाधीनता-आन्दोलन के दौरान बंगाल में विभिन्न रैलियों में जोश भरने के लिए यह गीत गाया जाता था। आजादी के दिवानों के इस गीत की लोकप्रियता से ब्रिटिश सरकार इतनी अधिक भयभीत हो गई थी कि उसने इस पर प्रतिबन्ध लगाने पर विचार करना शुरू कर दिया। आजादी के बाद अब इस राष्ट्रगीत को लेकर मन को विचलित करने वाला विवाद मीडिया में छाया हुआ है। देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले शहीदों का सम्मान गीत वंदे मातरम् एक बार फिर राजनीति के दलदल में फंस गया है। प्रदेश की राजधानी में प्रतिमाह के पहले दिन होने वाले वंदे मातरम् के गायन को बंद कर दिया गया। तर्क है सिर्फ एक दिन गाने से देशभक्ति नहीं दिखती। राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को तर्क की कसौटी पर रखना किसी भी दृष्टि से न्यायोचित नहीं है। अपनी जन्मभूमि की वंदना देशभक्ति, राजनीति, समाज से भी ऊपर है। राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान देश की अस्मिता और आन-बान-शान के प्रतीक हैं ना कि राजनीति के हथियार। ये जन्मभूमि ही तो अपने अन्न और जल से हमारा पोषण कर रही है तो इस पालनहार की वंदना पर सवाल क्यों ? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले खेल समारोह में जब भी कोई खिलाड़ी जीत हासिल करता है तो राष्ट्रगान के साथ उसका सम्मान होता है यानि देश का प्रतिनिधित्व उसका राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत करता है तो हम इस पर सवाल उठाकर अपने देश के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर रहे हैं। प्रदेश और देश में आमजन से जुड़ी अनेक समस्याएं हैं ऐसे में राष्ट्रगीत पर सियासी बवाल राजनीति के निम्नतम स्तर को प्रमाणित कर रहा है। सिर शर्म से झुक जाता है जब वंदे मातरम् को राजनीति में तुष्टिकरण के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। ये भी एक बड़ा विचारणीय प्रश्न है कि धर्म को जन्मभूमि की वंदना से भी ऊपर रख दिया गया है। सीधी सी बात है जब जन्मभूमि ही नहीं होगी तो धर्म का अस्तित्व कहां से होगा। बीबीसी वल्र्ड सर्विस ने वर्ष २००३ में दुनियाभर से सर्वश्रेष्ठ ७ हजार गीतों का चयन किया था। इसमें दुनिया के १५५ देशों के लोगों ने गीतों को लेकर अपना मत दिया था। इनमें से चुने गए दुनिया के १० सर्वश्रेष्ठ चुने गए गीतों में वंदेमारतम् दूसरे स्थान पर था। अफसोस जिस गीत को दुनिया ने मान लिया है उसे अपनी ही भूमि पर राजनीति का शिकार होना पड़ रहा है।

