Wednesday, January 2, 2019

शहादत और जन्मभूमि का सम्मान है वंदे मातरम्


शहादत और जन्मभूमि का सम्मान है वंदे मातरम् 

मनीन्द्र कुमार दुबे
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में देश में आजादी की अलख जगाने वाला वंदे मातरम् इन दिनों सियासी दांव-पेंच का शिकार हो गया है। स्वाधीनता-आन्दोलन के दौरान बंगाल में विभिन्न रैलियों में जोश भरने के लिए यह गीत गाया जाता था। आजादी के दिवानों के इस गीत की लोकप्रियता से ब्रिटिश सरकार इतनी अधिक भयभीत हो गई थी कि उसने इस पर प्रतिबन्ध लगाने पर विचार करना शुरू कर दिया। आजादी के बाद अब इस राष्ट्रगीत को लेकर मन को विचलित करने वाला विवाद मीडिया में छाया हुआ है। देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले शहीदों का सम्मान गीत वंदे मातरम् एक बार फिर राजनीति के दलदल में फंस गया है। प्रदेश की राजधानी में प्रतिमाह के पहले दिन होने वाले वंदे मातरम् के गायन को बंद कर दिया गया। तर्क है सिर्फ एक दिन गाने से देशभक्ति नहीं दिखती। राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को तर्क की कसौटी पर रखना किसी भी दृष्टि से न्यायोचित नहीं है। अपनी जन्मभूमि की वंदना देशभक्ति, राजनीति, समाज से भी ऊपर है। राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान देश की अस्मिता और आन-बान-शान के प्रतीक हैं ना कि राजनीति के हथियार। ये जन्मभूमि ही तो अपने अन्न और जल से हमारा पोषण कर रही है तो इस पालनहार की वंदना पर सवाल क्यों ? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले खेल समारोह में जब भी कोई खिलाड़ी जीत हासिल करता है तो राष्ट्रगान के साथ उसका सम्मान होता है यानि देश का प्रतिनिधित्व उसका राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत करता है तो हम इस पर सवाल उठाकर अपने देश के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर रहे हैं। प्रदेश और देश में आमजन से जुड़ी अनेक समस्याएं हैं ऐसे में राष्ट्रगीत पर सियासी बवाल राजनीति के निम्नतम स्तर को प्रमाणित कर रहा है। सिर शर्म से झुक जाता है जब वंदे मातरम् को राजनीति में तुष्टिकरण के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। ये भी एक बड़ा विचारणीय प्रश्न है कि धर्म को जन्मभूमि की वंदना से भी ऊपर रख दिया गया है। सीधी सी बात है जब जन्मभूमि ही नहीं होगी तो धर्म का अस्तित्व कहां से होगा। बीबीसी वल्र्ड सर्विस ने वर्ष २००३ में दुनियाभर से सर्वश्रेष्ठ ७ हजार गीतों का चयन किया था। इसमें दुनिया के १५५ देशों के लोगों ने गीतों को लेकर अपना मत दिया था। इनमें से चुने गए दुनिया के १० सर्वश्रेष्ठ चुने गए गीतों में वंदेमारतम् दूसरे स्थान पर था। अफसोस जिस गीत को दुनिया ने मान लिया है उसे अपनी ही भूमि पर राजनीति का शिकार होना पड़ रहा है।

Sunday, December 16, 2012

तिलिस्मे मोहब्बत

 चांद घुलने लगा धीरे-धीरे
शब पिघलने लगी धीरे धीरे
ये तिलिस्मे-मोहब्बत है, क्या है,
जां निकलने लगी धीरे-धीरे।...

पर्वतों को खबर भी हुई ना,
फूटकर ऐसे निकला है झरना।
दिल में अहसास की प्यासी नदिया,
अब मचलने लगी धीरे-धीरे।....

एक मौसम जो ठहरा हुआ था,
मन का गुलशन जो सहरा हुआ था।
अजनबी एक खुशबू को छूकर,
रुत बदलने लगी धीरे-धीरे।....

तड़प है, कसक है ये क्या है,
शफक है, लहक है ये क्या है।
इक शरारा सा जो छू गया क्या,
रूह जलने लगी धीरे-धीरे।....

जी में आता है कुछ ख्वाब बुन लूं,
बिखरी हुई नीदें चुन लूं।
जिंदगी जो बिछड़ सी गई थी,
साथ चलने लगी धीरे-धीरे।.....

Thursday, July 5, 2012

बेटियों को बचाने दहर में,
आ गए साथ हम भी सफर में।
इन अंधेरों की फिक्र छोड़ दीजै,
जब मशालें उठा ली हैं कर में।

Monday, February 7, 2011

आ गया बसंत

खुशबू बिखर रही है यहां हर तरफ अनंत,
उतरा है रंग जिसका नहीं कहीं कोई अंत।
डाल-डाल खिलखिलाए, मुस्कराए फूल,
तुम भी मुस्कुरा दो सखी आ गया बसंत।

तेरी तस्वीर

रात जब डाल देती है परदा
तेरी आंखों के दो चिराग जल उठते हैं,
आसमान खींच देता है नीली चादर,
सितारे तेरे अंदाज में मुस्कराते हैं।
बादलों की ओट से झांकता चंद्रमा जैसे तुम हो।
रात लहराके जुल्फें अपनी बिखरा देती है।
चांदनी बिखेर देती है, तुम्हारा गोरा रंग,
जैसे वो दूध में नहाके चली आई  है
मंद-मंद चलती है इतराती हुई हवा,
जैसे तुम बाग में टहल रही हो।
झील के आइनें में देख-देख संवरती है खूबसूरती,
जैसे तुम सुब्ह श्रंगार कर रही हो।
रोज शाम को जब सूरज सो जाता है थककर
सारा मंजर तेरी तस्वीर बनाने में जुट जाता है।

Tuesday, August 31, 2010

अहसान कर गया बादल

अबकि अहसान कर गया बादल,
गोद नदिया की भर गया बादल।

बिजलियों से लिपटके रोया बहुत,
आँख धरती क़ी भर गया बादल।

खेल ठहरा मगन हवाओं का,
रेशा-रेशा बिखर गया बादल।

अब हवाएं पता बतायेंगी,
अबकि बारिश किधर गया बादल।

चढ़के अम्बर पे छा गया था जो,
जीना-जीना उतर गया बादल।

Monday, December 14, 2009

ज़ख्म ताज़ा हरा हरा-सा है।

ज़ख्म ताज़ा हरा हरा-सा है।
ये तजुर्बा नया नया-सा है।

वो जो घर है मेरे पिता जैसा,
और वो पेड़ भी दुआ-सा है।

शर्त थी सूर्य बांटने की यहाँ,
क्या हुआ हर तरफ कुहासा है।

कल जो निकला था बदलने  सूरत,
आज कितना थका थका-सा है।

उसको बातों में फंसाना मुश्किल,
बोलता वो नपा-तुला सा है।

नज़र

देख सुन्दरता तुम्हारी जूही भी शरमाएगी।
सादगी देखेगी तो ये चाँदनी जल जाएगी।
आ कपोलों को तेरे मैं चूमकर जूठा करूं,
इस ज़माने की नज़र वरना तुझे लग जाएगी।

Thursday, July 23, 2009

झील भी इतराई


झूमकर बरसे बादल तो झील भी इतराने लगी। बड़ी झील वही झील है जिसपर भोपाल के लोगों को नाज़ है। जिसे इस शहर की लाइफ लाइन भी कहा जाता है।

Sunday, July 12, 2009

संघ परिवार से एक कलात्मक संग्राम -हवीब तनवीर

भा ज पा और संघ परिवार को मेरे साथ क्या बैर हो सकता है? मेरी सांस्कृतिक गतिविधियों में क्यों बाधा डालते रहे हैं। आप कहेंगे पोंगा पंडित उर्फ़ जमादारिन के कारण। लेकिन पोंगा पंडित तो छुआछूत की बुरईयो को उभरता है। यह कम तो गांधीजी ने भी किया था। फिर पोंगा पंडित में तो अधर्म की बात है ही नहीं, बल्कि असल माएने में यह नाटक धार्मिक भावनाओं को बहुत अच्छे स्थान पर रखता है। क्या संघ परिवार इसलिए इस नाटक का विरोध करता है। इसमें धर्म ज्ञान की बातें एक शूद्र यानि एक जमादारिन करती है। या फिर शायद इसलिए कि इसमें एक लोभी पंडित कि खिल्ली उडाई गई है, फिर तो हमारे पुरोहितों कि सारी परम्परा को ही ग़लत कहना पड़ेगा। आप कहेंगे कि बेचारे राजनीति करने वाले लोग हमारे प्राचीन भारतीय साहित्य और हमारी संस्कृति को क्या जानें। इसमें सचाई कि कुछ झलक अवश्य है। फिर भला वो प्राचीन भारतीय संकृति का दम क्यों भरते हैं? आप कहेंगे सरे नेता गांधीजी का नम लेते हुए गाँधी जी कि विचारधारा के विरूद्व कम क्यों करते हैं। मैं बार-बार कहता रहा हूँ कि नाटक पोंगा पंडित न तो मेरा लिखा है न मेरा निर्देशित। इस पर आप शायद यही कहें कि अर्धसत्य तो सारी राजनीतिक पार्टियों की पालिसी का आधार है। लेकिन सछ बात तो यही है की यह नाटक मेरे होश सँभालने से पहले से चला आ रहा है। छत्तीसगढ़ के गाँव- गाँव में दिखा जा चुका है। हजारों लाखों की संख्या में हिंदू समाज इस नाटक को पिछले लगभग छः सात दशक से देखता और स्वीकार करता रहा है। देखकर आनद लेता रहा है और उसमे से किसी एक व्यक्ति ने भी आज तक इसमें आपत्तिजनक बात महसूस नहीं की है। शायद जावे कुछ लोग यह दें कि गाँव वाले क्या जानें। वो तो होते ही हैं गंवार यानि मूरख लेकिन इस नाटक पर संघ परिवार के हमलों के बाद भी जब-जब उनकी मौजूदगी से ज़रा हटकर यह नाटक बस्तियों, देहातों या शहरों में दिखाया जाता रहा है, कहीं भी कोई ऐसी-वैसी घटना देखने में नहीं आयी। फिर एक बात यह भी सच है, कि पोंगा पंडित पर हमलों से पहले मेरे नाटक संघ परिवार के हमलों का शिकार रहे हैं। हो सकता है कि मेरा नाम ही ग़लत हो, लेकिन इस दलील में भी खास दम नहीं है। इसलिए कि मेरे जैसे नाम वाले कुछ लोगों को तो भाजपा अपने दल में स्वीकार करती ही रहती हैं।
फिर एक बात यह भी सोचता हूँ कि मेरे नाटकों, कविताओं कि रचना और प्रस्तुतियां जो एक बहुत लंबे-चौडे काल में फैली हुई हैं। इनमें ऐसी कौन सी आपत्तिजनक बात संघ परिवार को दिखाई दी है? आख़िर संस्कृत के बहुतेरे नाटक, शेक्सपिअर, मोलियर, ब्रेख्त के नाटकों के अनुवाद, लोक शैली के प्रसिध्द नाटक ही तो मैं प्रस्तुत करता हूँ। देख रहे हैं नैन जैसे नाटकों में क्यों बढ़ा डाली गयी? लेकिन हो सकता है की मेरी विचारधारा जो मेरे नाटकों में नहीं मेरे पब्लिक लेक्चरों में प्रकट होती रही है इसमे कुछ उभरकर आ रहा है। इस पर आपत्ति हो इस प्रकार का मतभेद बहुत से सामाजिक, और राजनीतिक काम करने वालों के भाषणों में मिलता है। इनका जवाब तो आम तौर पर शब्दों में दिया जाता है। ईंट -पत्थरों से नहीं दिया जाता।