चाँद को छत पे उतर आने दे।चाँदनी से ज़रा बतियाने दे।
ज़िन्दगी और आ नज़दीक ज़रा,
साँस को साँस से टकराने दे।
होंठ पर होंठ ज़रा रखने दे,
रूह को काँप-काँप जाने दे।
मैं ही सुल्झाऊंगा तेरी उलझन,
तू मुझे होश में तो आने दे।
अपनी आँखों में उजाले भरकर,
मुझे जुनूं की राह जाने दे।
*शाहिद समर


