Wednesday, August 27, 2008

चाँद छत पर

चाँद को छत पे उतर आने दे।
चाँदनी से ज़रा बतियाने दे।

ज़िन्दगी और आ नज़दीक ज़रा,
साँस को साँस से टकराने दे।

होंठ पर होंठ ज़रा रखने दे,
रूह को काँप-काँप जाने दे।

मैं ही सुल्झाऊंगा तेरी उलझन,
तू मुझे होश में तो आने दे।

अपनी आँखों में उजाले भरकर,
मुझे जुनूं की राह जाने दे।

*शाहिद समर

Monday, August 25, 2008

सूर्य के आसपास

सूर्य के आसपास बैठी हैं,
आज किरणें उदास बैठी हैं।

फूल ने आज खुदकुशी की है,
तितलियां शव के पास बैठी हैं।

नह्र आएगी गांव में इक दिन,
क्यारियां लेके प्यास बैठी हैं।

धूप और चांदनी न जाने क्यों,
आज फिर पास-पास बैठी हैं।

कितनी पीढ़ाएं मेरी बस्ती में,
देखिए, बेलिबास बैठी हैं।

Sunday, August 24, 2008

खुशबू की ज़ुबानी


उसने खुशबू की ज़ुबानी लिख दी।
फूल ने प्रेम कहानी लिख दी।

मेरी आँखों, मेरी पलकों पे कहीं,
उसने दरिया की रवानी लिख दी।

सिरफिरा है कि उसने अरबी में,
जाने क्यों राम कहानी लिख दी।

अब कि चारागारों को चिट्ठी में,
हो गई पीर सयानी लिख दी।

अब कोई दिल का द्वार खुलता नहीं,
हादसों ने वो कहानी लिख दी।

विचारों की नदी

जिन विचारों की नदी से तख्त को ख़तरा हुआ,
उस नदी को शाप दे पत्थर बनाया जाएगा।

डिग्रियों के साथ बांटे थे सुखद सपने जिन्हें,
अब प्रशिक्षण दे उन्हें बुनकर बनाया जाएगा।

प्रश्न रोटी का उठाया आपने जो मित्रवर,
उनके द्वारा पोष्टिक उत्तर बनाया जाएगा।

चाँदमारी की तरह है राजनीति देश की,
हम सभी को बस निशाना भर जाएगा।

ज़ुल्म सहने वाले अवगत ही नही की उनकी ही,
चमड़ियों को खींचकर हंटर बनाया जाएगा।
*शाहिद समर


Saturday, August 23, 2008

दुपहर तक


जो उलट देते हैं बवंडर तक।
राह देते उन्हें समंदर तक।

हौंसले जब उड़ान भरते हैं,
छूट जाते हैं पीछे अम्बर तक।

मेरे जाने के बाद ऐसा हुआ,
अँधेरे आ गए दुपहर तक।

उम्र भर में पिता को बच्चों से,
क़र्ज़ की भाँति मिला आदर तक।

* शाहिद समर


Tuesday, August 12, 2008

दर्द की छत

काम अपने चाँदनी की क्या इमारत आएगी।
अपने हिस्से में तो केवल दर्द की छत आएगी।

आप भी मेरी तरह हैं भारतीय मित्रवर,
धीरे-धीरे आएगी मिटने की आदत आएगी।

पहले मीनारों पे नाचेगी फ़िर उसके बाद में,
तेरे घर भी रौशनी आएगी विधिवत आएगी।

Sunday, August 10, 2008

पत्तियों के हाथ


पत्तियों के हाथ पीले हो गए।
शाख से सम्बन्ध ढीले हो गए।

हर सज़ा वरदान जैसे बांसुरी,
ज़ख्म खाए और सुरीले हो गए।

फिर किसी की आँख से आँसू गिरा,
रंग जो सूखे थे गीले हो गए।


धर्म, जाति और हैं फिरके हैं कई,
देश में कितने कबीले हो गए।

सबको अपने कद की यूँ चिंता हुई,
रेत के हर ओर टीले हो गए।
* शाहिद समर


नेह की उर्वशी

नेह की उर्वशी से मिले।
सच कहें जिंदगी से मिले।

बीत सदियां गई हैं कई,
चाँद को चाँदनी से मिले।

अपने पर उनको छोटे लगे,
काग जब हंसनी से मिले।

जब भी दंगा शहर में हुआ
सरे शव झोपड़ी से मिले।

* शाहिद समर