चाँद को छत पे उतर आने दे।चाँदनी से ज़रा बतियाने दे।
ज़िन्दगी और आ नज़दीक ज़रा,
साँस को साँस से टकराने दे।
होंठ पर होंठ ज़रा रखने दे,
रूह को काँप-काँप जाने दे।
मैं ही सुल्झाऊंगा तेरी उलझन,
तू मुझे होश में तो आने दे।
अपनी आँखों में उजाले भरकर,
मुझे जुनूं की राह जाने दे।
*शाहिद समर
5 comments:
bada achha prayas hai aapka. nirantarata banaen.
email ki bajay blog par tippani karen.
dhanywad
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yogindermoudgil.blogspot.com
.....मैमैं ही सुल्झाऊंगा तेरी उलझन,
मुझे तू होश में तो आने दे।
क्या बात है शाहिद जी....मजा आ गया और मेरी हौसलाअफ़जाई का बहुत बहुत शुक्रिया.और आपके ब्लौग पे इतनी अच्छी रचनायें देख प्रफ़्फ़ुलित हो गया मन.शुभकामनायें
कमाल का लिखा है शाहिद साहब
चाँद को छत पे उतर आने दे।
चाँदनी से ज़रा बतियाने दे।
ज़िन्दगी और आ नज़दीक ज़रा,
साँस को साँस से टकराने दे।
बहुत अच्छी रचना है...
'seen your blog first time. Very touching romantic and emotional words. Loved reading them' Regards
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