Monday, February 7, 2011

आ गया बसंत

खुशबू बिखर रही है यहां हर तरफ अनंत,
उतरा है रंग जिसका नहीं कहीं कोई अंत।
डाल-डाल खिलखिलाए, मुस्कराए फूल,
तुम भी मुस्कुरा दो सखी आ गया बसंत।

तेरी तस्वीर

रात जब डाल देती है परदा
तेरी आंखों के दो चिराग जल उठते हैं,
आसमान खींच देता है नीली चादर,
सितारे तेरे अंदाज में मुस्कराते हैं।
बादलों की ओट से झांकता चंद्रमा जैसे तुम हो।
रात लहराके जुल्फें अपनी बिखरा देती है।
चांदनी बिखेर देती है, तुम्हारा गोरा रंग,
जैसे वो दूध में नहाके चली आई  है
मंद-मंद चलती है इतराती हुई हवा,
जैसे तुम बाग में टहल रही हो।
झील के आइनें में देख-देख संवरती है खूबसूरती,
जैसे तुम सुब्ह श्रंगार कर रही हो।
रोज शाम को जब सूरज सो जाता है थककर
सारा मंजर तेरी तस्वीर बनाने में जुट जाता है।