Monday, December 14, 2009

ज़ख्म ताज़ा हरा हरा-सा है।

ज़ख्म ताज़ा हरा हरा-सा है।
ये तजुर्बा नया नया-सा है।

वो जो घर है मेरे पिता जैसा,
और वो पेड़ भी दुआ-सा है।

शर्त थी सूर्य बांटने की यहाँ,
क्या हुआ हर तरफ कुहासा है।

कल जो निकला था बदलने  सूरत,
आज कितना थका थका-सा है।

उसको बातों में फंसाना मुश्किल,
बोलता वो नपा-तुला सा है।

नज़र

देख सुन्दरता तुम्हारी जूही भी शरमाएगी।
सादगी देखेगी तो ये चाँदनी जल जाएगी।
आ कपोलों को तेरे मैं चूमकर जूठा करूं,
इस ज़माने की नज़र वरना तुझे लग जाएगी।