Sunday, August 10, 2008

पत्तियों के हाथ


पत्तियों के हाथ पीले हो गए।
शाख से सम्बन्ध ढीले हो गए।

हर सज़ा वरदान जैसे बांसुरी,
ज़ख्म खाए और सुरीले हो गए।

फिर किसी की आँख से आँसू गिरा,
रंग जो सूखे थे गीले हो गए।


धर्म, जाति और हैं फिरके हैं कई,
देश में कितने कबीले हो गए।

सबको अपने कद की यूँ चिंता हुई,
रेत के हर ओर टीले हो गए।
* शाहिद समर


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