भा ज पा और संघ परिवार को मेरे साथ क्या बैर हो सकता है? मेरी सांस्कृतिक गतिविधियों में क्यों बाधा डालते रहे हैं। आप कहेंगे पोंगा पंडित उर्फ़ जमादारिन के कारण। लेकिन पोंगा पंडित तो छुआछूत की बुरईयो को उभरता है। यह कम तो गांधीजी ने भी किया था। फिर पोंगा पंडित में तो अधर्म की बात है ही नहीं, बल्कि असल माएने में यह नाटक धार्मिक भावनाओं को बहुत अच्छे स्थान पर रखता है। क्या संघ परिवार इसलिए इस नाटक का विरोध करता है। इसमें धर्म ज्ञान की बातें एक शूद्र यानि एक जमादारिन करती है। या फिर शायद इसलिए कि इसमें एक लोभी पंडित कि खिल्ली उडाई गई है, फिर तो हमारे पुरोहितों कि सारी परम्परा को ही ग़लत कहना पड़ेगा। आप कहेंगे कि बेचारे राजनीति करने वाले लोग हमारे प्राचीन भारतीय साहित्य और हमारी संस्कृति को क्या जानें। इसमें सचाई कि कुछ झलक अवश्य है। फिर भला वो प्राचीन भारतीय संकृति का दम क्यों भरते हैं? आप कहेंगे सरे नेता गांधीजी का नम लेते हुए गाँधी जी कि विचारधारा के विरूद्व कम क्यों करते हैं। मैं बार-बार कहता रहा हूँ कि नाटक पोंगा पंडित न तो मेरा लिखा है न मेरा निर्देशित। इस पर आप शायद यही कहें कि अर्धसत्य तो सारी राजनीतिक पार्टियों की पालिसी का आधार है। लेकिन सछ बात तो यही है की यह नाटक मेरे होश सँभालने से पहले से चला आ रहा है। छत्तीसगढ़ के गाँव- गाँव में दिखा जा चुका है। हजारों लाखों की संख्या में हिंदू समाज इस नाटक को पिछले लगभग छः सात दशक से देखता और स्वीकार करता रहा है। देखकर आनद लेता रहा है और उसमे से किसी एक व्यक्ति ने भी आज तक इसमें आपत्तिजनक बात महसूस नहीं की है। शायद जावे कुछ लोग यह दें कि गाँव वाले क्या जानें। वो तो होते ही हैं गंवार यानि मूरख लेकिन इस नाटक पर संघ परिवार के हमलों के बाद भी जब-जब उनकी मौजूदगी से ज़रा हटकर यह नाटक बस्तियों, देहातों या शहरों में दिखाया जाता रहा है, कहीं भी कोई ऐसी-वैसी घटना देखने में नहीं आयी। फिर एक बात यह भी सच है, कि पोंगा पंडित पर हमलों से पहले मेरे नाटक संघ परिवार के हमलों का शिकार रहे हैं। हो सकता है कि मेरा नाम ही ग़लत हो, लेकिन इस दलील में भी खास दम नहीं है। इसलिए कि मेरे जैसे नाम वाले कुछ लोगों को तो भाजपा अपने दल में स्वीकार करती ही रहती हैं।
फिर एक बात यह भी सोचता हूँ कि मेरे नाटकों, कविताओं कि रचना और प्रस्तुतियां जो एक बहुत लंबे-चौडे काल में फैली हुई हैं। इनमें ऐसी कौन सी आपत्तिजनक बात संघ परिवार को दिखाई दी है? आख़िर संस्कृत के बहुतेरे नाटक, शेक्सपिअर, मोलियर, ब्रेख्त के नाटकों के अनुवाद, लोक शैली के प्रसिध्द नाटक ही तो मैं प्रस्तुत करता हूँ। देख रहे हैं नैन जैसे नाटकों में क्यों बढ़ा डाली गयी? लेकिन हो सकता है की मेरी विचारधारा जो मेरे नाटकों में नहीं मेरे पब्लिक लेक्चरों में प्रकट होती रही है इसमे कुछ उभरकर आ रहा है। इस पर आपत्ति हो इस प्रकार का मतभेद बहुत से सामाजिक, और राजनीतिक काम करने वालों के भाषणों में मिलता है। इनका जवाब तो आम तौर पर शब्दों में दिया जाता है। ईंट -पत्थरों से नहीं दिया जाता।
Sunday, July 12, 2009
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