सूर्य के आसपास बैठी हैं,
आज किरणें उदास बैठी हैं।
फूल ने आज खुदकुशी की है,
तितलियां शव के पास बैठी हैं।
नह्र आएगी गांव में इक दिन,
क्यारियां लेके प्यास बैठी हैं।
धूप और चांदनी न जाने क्यों,
आज फिर पास-पास बैठी हैं।
कितनी पीढ़ाएं मेरी बस्ती में,
देखिए, बेलिबास बैठी हैं।
आज किरणें उदास बैठी हैं।
फूल ने आज खुदकुशी की है,
तितलियां शव के पास बैठी हैं।
नह्र आएगी गांव में इक दिन,
क्यारियां लेके प्यास बैठी हैं।
धूप और चांदनी न जाने क्यों,
आज फिर पास-पास बैठी हैं।
कितनी पीढ़ाएं मेरी बस्ती में,
देखिए, बेलिबास बैठी हैं।
2 comments:
जितना आपको पढ़ रहा हूँ उतना ही मज़ा आ रहा है, कमाल!
ब्लॉग की गलियों में आपका हार्दिक अभिनन्दन!
आपकी पोस्ट देखकर ये तो कह ही सकता हूँ कि अपने जज्बे को बनाए रखिये और सपने देखना कभी न छोडिये.
कभी फ़ुर्सत मिले तो मेरे दिन-रात भी ज़रूर देख आयें.
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