
जो उलट देते हैं बवंडर तक।
राह देते उन्हें समंदर तक।
हौंसले जब उड़ान भरते हैं,
छूट जाते हैं पीछे अम्बर तक।
मेरे जाने के बाद ऐसा हुआ,
अँधेरे आ गए दुपहर तक।
उम्र भर में पिता को बच्चों से,
क़र्ज़ की भाँति मिला आदर तक।
राह देते उन्हें समंदर तक।
हौंसले जब उड़ान भरते हैं,
छूट जाते हैं पीछे अम्बर तक।
मेरे जाने के बाद ऐसा हुआ,
अँधेरे आ गए दुपहर तक।
उम्र भर में पिता को बच्चों से,
क़र्ज़ की भाँति मिला आदर तक।
* शाहिद समर
6 comments:
मेरे जाने के बाद ऐसा हुआ,
अँधेरे आ गए दुपहर तक।
उम्र भर में पिता को बच्चों से,
क़र्ज़ की भाँति मिला आदर तक।
बहुत अच्छा लिखा है. सस्नेह
क़ाबिले-तारीफ़ कृति है!
bahut sundar, keep it up...shubhkamnayen
हौंसले जब उड़ान भरते हैं,
छूट जाते हैं पीछे अम्बर तक।
आपका लेखन उम्दा है : कभी समय निकाल कर इधर भी नज़र करें
http://manoria.blog.co.in and http://manoriablospot.com
इसी तरह आपके हौंसलों की उड़ान जारी रहे।
बहुत अच्छी रचना. शुक्रिया.
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