Saturday, August 23, 2008

दुपहर तक


जो उलट देते हैं बवंडर तक।
राह देते उन्हें समंदर तक।

हौंसले जब उड़ान भरते हैं,
छूट जाते हैं पीछे अम्बर तक।

मेरे जाने के बाद ऐसा हुआ,
अँधेरे आ गए दुपहर तक।

उम्र भर में पिता को बच्चों से,
क़र्ज़ की भाँति मिला आदर तक।

* शाहिद समर


6 comments:

शोभा said...

मेरे जाने के बाद ऐसा हुआ,
अँधेरे आ गए दुपहर तक।

उम्र भर में पिता को बच्चों से,
क़र्ज़ की भाँति मिला आदर तक।
बहुत अच्छा लिखा है. सस्नेह

Vinay said...

क़ाबिले-तारीफ़ कृति है!

उमाशंकर मिश्र said...

bahut sundar, keep it up...shubhkamnayen

प्रदीप मानोरिया said...

हौंसले जब उड़ान भरते हैं,
छूट जाते हैं पीछे अम्बर तक।
आपका लेखन उम्दा है : कभी समय निकाल कर इधर भी नज़र करें
http://manoria.blog.co.in and http://manoriablospot.com

Hari Joshi said...

इसी तरह आपके हौंसलों की उड़ान जारी रहे।

Amit K Sagar said...

बहुत अच्छी रचना. शुक्रिया.