ज़ख्म ताज़ा हरा हरा-सा है।
ये तजुर्बा नया नया-सा है।
वो जो घर है मेरे पिता जैसा,
और वो पेड़ भी दुआ-सा है।
शर्त थी सूर्य बांटने की यहाँ,
क्या हुआ हर तरफ कुहासा है।
कल जो निकला था बदलने सूरत,
आज कितना थका थका-सा है।
उसको बातों में फंसाना मुश्किल,
बोलता वो नपा-तुला सा है।
ये तजुर्बा नया नया-सा है।
वो जो घर है मेरे पिता जैसा,
और वो पेड़ भी दुआ-सा है।
शर्त थी सूर्य बांटने की यहाँ,
क्या हुआ हर तरफ कुहासा है।
कल जो निकला था बदलने सूरत,
आज कितना थका थका-सा है।
उसको बातों में फंसाना मुश्किल,
बोलता वो नपा-तुला सा है।
1 comment:
भैया आपके चाहने वाले अभी यहाँ है ..लिखते रहो - शरद कोकास , न्यूआदर्शनगर दुर्ग
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